Tuesday, April 28, 2020

Top 10 Kids Moral Story in Hindi - लोकप्रिय नैतिक कहानियां हिंदी में

Top 10 Moral Stories in Hindi - मेरे प्यारे दोस्तों स्वागत है आप सबका kidskahani.com वेबसाइट में बहुत दिनों के बाद आज आप सबके लिए एक पोस्ट पब्लिश किया हूं जिसमें Top 10 Moral Stories in Hindi, तो आइए हम सब मिलकर पढ़ते हैं Moral Stories ( मोरल स्टोरी ) हिंदी में मुझे उम्मीद है की यह सब कहानी Moral Stories आप सबको बहुत ही अच्छी लगेगी |


1. Kids Moral Story in Hindi - काले कौवे की दुःखी कहानी






एक जंगल में एक कौवा रहता था और वह अपनी जिंदगी से बहुत दुखी था.वह जब भी जंगल में घूमता तो दुसरे पक्षियों को भी देखता था और उन्हें देखकर उसे लगता की उसका रंग बहुत काला है और यही उसके दुःख का असली कारण था. अब रोज का यही सिलसिला था तो वह कौवा उदास रहने लग गया था।


एक दिन जब वह जंगल में उड़ रहा था तो उसने एक तालाब में बतख को तैरते देखा तो वह एक पेड़ में बैठ गया और सोचने लगा की यह बतख कितना सफ़ेद है.काश मेरा भी रंग सफ़ेद होता. फिर कुछ देर बाद वह कौवा बतख के पास गया|


बतख के पास जाते ही कौवा उससे बोला- तुम बहुत खुशकिस्मत हो जो तुम्हारा रंग सफ़ेद है. बतख ने कौवे की बात सुनी|
बतख ने कौवे से बोला- हाँ मैं सफ़ेद तो हूँ लेकिन जब मैं हरे रंग के तोते को देखता हूँ तो मुझे अपने इस सफ़ेद रंग से गुस्सा आता है।
बतख की बात सुनकर वह कौवा वहा से चला गया और कुछ समय बाद वह तोते के पास पहुंचा.

कौवा तोते से बोला- तुम्हारा रंग तो बहुत सुन्दर है तुमको यह देखकर बहुत अच्छा लगता होगा।
कौवे की बात सुनकर तोता बोला- हाँ,मुझे लगता तो अच्छा है की मैं इतना सुंदर हूँ लेकिन मैं सिर्फ हरा हूँ और जब कभी भी मैं मोर को देख लेता हूँ तो मुझे बहुत बुरा लगता है क्योंकि मोर बहुत खुबसूरत है और उसके पास बहुत सारे रंग है.

कौवे को लगा यह बात भी सही है क्यों न अब मोर के पास ही चला जाय.
वह कौवा जंगल में मोर को ढूढने लगा किन्तु उसे मोर नहीं मिला फिर वह कुछ दिन बाद एक चिड़ियाघर में जा पहुंचा.
जहा उसे मोर दिख गया लेकिन मोर को देखने के लिए बहुत सारे लोगो की भीड़ जमा हुई थी तो कौवा उन लोगो के जाने का इन्तेजार करने लगा. जब वे सब लोग चले गये तो...

कौवा मोर के पास पहुंचा और मोर से बोला- वाह मोर,तुम तो सच में बहुत खुबसूरत हो तभी सब तुम्हारी इतनी तारीफ करते है. तुमको तो खुद पर बहुत गर्व महसूस होता होगा.
कौवे की बात सुनकर मोर बड़े दुःख के साथ बोला- तुम्हारी बात बिल्कुल ठीक है पर मेरे अलावा इस दुनिया में कोई और दूसरा खुबसूरत पक्षी नहीं है इसलिए मैं यहाँ चिड़ियाघर में कैद हूँ।

यहाँ पर सब मेरी रखवाली करते है जिस कारण में कही भी नहीं जा सकता और अपने मन के मुताबिक कुछ भी नहीं कर सकता है.
मैं भी काश तुम्हारी तरह कौवा होता तो मुझे भी कोई कैद करके नहीं रखता और मैं भी हमेशा तुम्हारी तरह खुले आसमान में जहा चाहो वहा घूमता रहता पर एक मोर के लिए यह सब मुमकिन नहीं.
कौवे ने मोर की सारी बातें सुनी और फिर वहा से चले गया और सारी बात समझ गया. उसे इस बात का अहसास हो गया था कि सिर्फ वो ही नहीं बल्कि हर कोई उसकी तरह दुखी और परेशान है।

इस कहानी की प्रेरणा- कोई आदमी कितना सुखी है वह सिर्फ वो ही आदमी जानता है क्योंकि हर किसी के अपने जीवन में कई परेशानीयाँ होती है अपने दुःख होते है। इसलिए हमें दुसरे के सुख से जलन न करते हुए उससे सीखना चाहिए तथा खुद में जो अच्छी चीजे है उनको देखना चाहिए न की कमजोरी को. अगर कोई कमजोरी होती भी है तो उसे दूर करना चाहिये.


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चोरी पकड़ी

एक बार राजा कृष्णदेव राय के राज्य विजयनगर में लगातार चोरी होनी शुरू हुई। सेठों ने आकर राजा के दरबार में दुहाई दी, 'महाराज हम लूट गए बरबाद हो गए। रात को ताला तोड़कर चोर हमारी तिजोरी का सारा धन उड़ा ले गए।'
राजा कृष्णदेव राय ने इन घटनाओं की जांच कोतवाल से करवाई, पर कुछ भी हाथ नहीं लगा। वे बहुत चिंतित हुए। चोरी की घटनाएं होती रहीं। चोरों की हिम्मत बढ़ती जा रही थी।
अंत में राजा ने दरबारियों से जोर आवाज़ में कहा, 'क्या आप में से कोई भी ऐसा नहीं, जो चोरों को पकड़वाने की जिम्मेदारी ले सके?'
सारे दरबारी एक- दूसरे का मुंह देखने लगे। तेनालीराम ने उठकर कहा, 'महाराज यह जिम्मेदारी मैं लूंगा।'
वहां से उठकर तेनालीराम नगर के एक प्रमुख जौहरी के यहां गया। उसने अपनी योजना उसे बताई और घर लौट गया। उस जौहरी ने अगले दिन अपने यहां आभूषणों की एक बड़ी प्रदर्शनी लगवाई। रात होने पर उसने सारे आभूषणों को एक तिजोरी में रखकर ताला लगा दिया।
आधी रात को चोर आ धमके। ताला तोड़कर तिजोरी में रखे सारे आभूषण थैले में डालकर वे बाहर आए। जैसे ही वे सेठ की हवेली से बाहर जाने लगे सेठ को पता चल गया, उसने शोर मचा दिया।
आस-पास के लोग भी आ जुटे। तेनालीराम भी अपने सिपाहियों के साथ वहां आ धमके और बोले, 'जिनके हाथों में रंग लगा हुआ है, उन्हें पकड़ लो।' जल्द ही सारे चोर पकड़े गए। अगले दिन चोरों को दरबार में पेश किया गया। सभी के हाथों पर लगे रंग देखकर राजा ने पूछा, 'तेनालीरामजी यह क्या है?'
'महाराज हमने तिजोरी पर गीला रंग लगा दिया था ताकि चोरी के इरादे से आए चोरों के शरीर पर रंग चढ़ जाए और हम उन्हें आसानी से पकड़ सकें।'
राजा ने पूछा, 'पर आप वहां सिपाहियों को तैनात कर सकते थे।'
'महाराज इसमें सिपाहियों को चोरों से मिल जाने की संभावना थी।'
यह सुनकर राजा कृष्णदेव राय ने तेनालीराम की खूब प्रशंसा की और चोरों को आसानी के साथ पकड़ लिया गया|



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अरबी घोड़े

महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक दिन एक अरब प्रदेश का व्यापारी घोड़े बेचने आता है। वह अपने घोड़ो का बखान कर के महाराज कृष्णदेव राय को सारे घोड़े खरीदने के लिए राजी कर लेता है तथा अपने घोड़े बेच जाता है। अब महाराज के घुड़साल इतने अधिक घोड़े हो जाते हैं कि उन्हें रखने की जगह नहीं बचती, इसलिए महाराज के आदेश पर बहुत से घोड़ों को विजयनगर के आम नागरिकों और राजदरबार के कुछ लोगों को तीन महीने तक देखभाल के लिए दे दिया जाता है। हर एक देखभाल करने वाले को घोड़ों के पालन खर्च और प्रशिक्षण के लिए प्रति माह एक सोने का सिक्का दिया जाता है।
विजयनगर के सभी नागरिकों की तरह चतुर तेनालीराम को भी एक घोडा दिया गया। तेनालीराम ने घोड़े को घर लेजा कर घर के पीछे एक छोटी सी घुड़साल बना कर बांध दिया और घुड़साल की नन्ही खिड़की से उसे हर रोज थोड़ी मात्रा में चारा खिलाने लगे।
बाकी लोग भी महाराज कृष्णदेव राय की सौंपी गयी ज़िम्मेदारी को निभाने लगे। महाराज नाराज ना हो जाए और उन पर क्रोधित हो कोई दंड ना दे दें; इस भय से सभी लोग अपना पेट काट-काट कर भी घोड़े को उत्तम चारा खरीद कर खिलाने लगे।
ऐसा करते-करते तीन महीने बीत जाते हैं। तय दिन सारे नागरिक घोड़ो को लेकर महाराज कृष्णदेव राय के समक्ष इकठ्ठा हो जाते हैं पर तेनालीराम खाली हाथ आते हैं। राजगुरु तेनालीराम के घोड़ा ना लाने की वजह पूछते है। तेनालीराम उत्तर मे कहते है कि घोड़ा काफी बिगडैल और खतरनाक हो चुका है और वह खुद उस घोड़े के समीप नहीं जाना चाहते हैं। राजगुरु , महाराज कृष्णदेव राय को कहते है के तेनालीराम झूठ बोल रहे है। महाराज कृष्णदेव राय सच्चाई का पता लगाने के लिए और तेनालीराम के साथ राजगुरु को भेजते हैं।
तेनालीराम के घर के पीछे बनी छोटी सी घुड़साल देख राजगुरु कहते है कि अरे मूर्ख मानव तुम इस छोटी कुटिया को घुड़साल कहते हो? तेनालीराम बड़े विवेक से राजगुरु से कहते है के क्षमा करें मैं आप की तरह विद्वान नहीं हूँ। कृपया घोड़े को पहले खिड़की से झाँक कर देख लें और उसके पश्चात ही घुड़साल के अंदर कदम रखें।
राजगुरु जैसे ही खिड़की से अंदर झाँकते हैं, घोडा लपक कर उनकी दाढ़ी पकड़ लेता है। लोग जमा होने लगते हैं। काफी मशक्कत करने के बाद भी भूखा घोड़ा राजगुरु की दाढ़ी नहीं छोड़ता है। अंततः कुटिया तोड़ कर तेज हथियार से राजगुरु की दाढ़ी काट कर उन्हे घोड़े के चंगुल से छुड़ाया जाता है। परेशान राजगुरु और चतुर तेनालीराम भूखे घोड़े को ले कर राजा के पास पहुँचते हैं।
घोड़े की दुबली-पतली हालत देख कर महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम से इसका कारण पूछते हैं। तेनालीराम कहते है कि मैं घोड़े को प्रति दिन थोड़ा सा चारा ही देता था, जिस तरह आप की गरीब प्रजा थोड़ा भोजन कर के गुजारा करती है। और आवश्यकता से कम सुविधा मिलने के कारण घोडा और व्यथित और बिगड़ेल होता गया। ठीक वैसे ही जैसे के आप की प्रजा परिवार पालन की जिम्मेदारी के अतिरिक्त, घोड़ो को संभालने के बोझ से त्रस्त हुई।
राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना होता है। उन पर अधिक बोझ डालना नहीं। आपके दिये हुए घोड़े पालने के कार्य-आदेश से घोड़े तो बलवान हो गए पर आप की प्रजा दुर्बल हो गयी है। महाराज कृष्णदेव राय को तेनालीराम की यह बात समझ में आ जाती है, और वह तेनालीराम की प्रसंशा करते हुए उन्हे पुरस्कार देते है।

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जादुई कुएं

एक बार राजा कृष्णदेव राय ने अपने गृहमंत्री को राज्य में अनेक कुएं बनाने का आदेश दिया। गर्मियां पास आ रही थीं इसलिए राजा चाहते थे कि कुएं शीघ्र तैयार हो जाएं ताकि लोगों को गर्मियों में थोड़ी राहत मिल सके।
गृहमंत्री ने इस कार्य के लिए शाही कोष से बहुत-सा धन लिया। शीघ्र ही राजा के आदेशानुसार नगर में अनेक कुएं तैयार हो गए। इसके बाद एक दिन राजा ने नगर भ्रमण किया और कुछ कुओं का स्वयं निरीक्षण किया। अपने आदेश को पूरा होते देख वे संतुष्ट हो गए।
गर्मियों में एक दिन नगर के बाहर से कुछ गांव वाले तेनालीराम के पास पहुंचे, वे सभी गृहमंत्री के विरुद्ध शिकायत लेकर आए थे। तेनालीराम ने उनकी शिकायत सुनी और उन्हें न्याय प्राप्त करने का रास्ता बताया।
तेनालीराम अगले दिन राजा से मिले और बोले, 'महाराज! मुझे विजयनगर में कुछ चोरों के होने की सूचना मिली है। वे हमारे कुएं चुरा रहे हैं।'
इस पर राजा बोले, 'क्या बात करते हो, तेनाली! कोई चोर कुएं को कैसे चुरा सकता है?'
'महाराज! यह बात आश्चर्यजनक जरूर है, परंतु सच है। वे चोर अब तक कई कुएं चुरा चुके हैं।' तेनालीराम ने बहुत ही भोलेपन से कहा।
उसकी बात को सुनकर दरबार में उपस्थित सभी दरबारी हंसने लगे।
महाराज ने कहा, 'तेनालीराम, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है। आज कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो? तुम्हारी बातों पर कोई भी व्यक्ति विश्वास नहीं कर सकता।'
'महाराज! मैं जानता था कि आप मेरी बात पर विश्वास नहीं करंगे इसलिए मैं कुछ गांव वालों को साथ साथ लाया हूं। वे सभी बाहर खड़े हैं। यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो आप उन्हें दरबार में बुलाकर पूछ लीजिए। वे आपको सारी बात विस्तारपूर्वक बता दंगे।'
राजा ने बाहर खड़े गांव वालों को दरबार में बुलवाया। एक गांव वाला बोला, 'महाराज! गृहमंत्री द्वारा बनाए गए सभी कुएं समाप्त हो गए हैं, आप स्वयं देख सकते हैं।'
राजा ने उनकी बात मान ली और गृहमंत्री, तेनालीराम, कुछ दरबारियों तथा गांव वालों के साथ कुओं का निरीक्षण करने के लिए चल दिए। पूरे नगर का निरीक्षण करने के पश्चात उन्होंने पाया कि राजधानी के आस-पास के अन्य स्थानो तथा गांवों में कोई कुआं नहीं है।
राजा को यह पता लगते देख गृहमंत्री घबरा गया। वास्तव में उसने कुछ कुओं को ही बनाने का आदेश दिया था। बचा हुआ धन उसने अपनी सुख-सुविधाओं पर व्यय कर दिया।
अब तक राजा भी तेनालीराम की बात का अर्थ समझ चुके थे। वे गृहमंत्री पर क्रोधित होने लगे, तभी तेनालीराम बीच में बोल पड़ा, 'महाराज! इसमें इनका कोई दोष नहीं है। वास्तव में वे जादुई कुएं थे, जो बनने के कुछ दिन बाद ही हवा में समाप्त हो गए।'
अपनी बात समाप्त कर तेनालीराम गृहमंत्री की ओर देखने लगा। गृहमंत्री ने अपना सिर शर्म से झुका लिया।
राजा ने गृहमंत्री को बहुत डांटा तथा उसे सौ और कुएं बनवाने का आदेश दिया। इस कार्य की सारी जिम्मेदारी तेनालीराम को सौंपी गई।






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बिल्ली के लिए गाय

एक बार की बात है, बहुत सारे चूहों ने विजयनगर के लोगों को परेशान कर रखा था। चूहों से छुटकारा पाने की बहुत कोशिशें की गईं। अंत में इस समस्या के हल के लिए राजा ने घोषणा की कि चूहों को पकड़ने के लिए प्रत्येक परिवार को एक-एक बिल्ली दी जाएगी।
बिल्ली की देखरेख का बोझ लोगों पर न पड़े इसलिए प्रत्येक घर को एक-एक गाय भी दी जाएगी जिससे कि उस गाय का दूध बिल्लियों को पिलाया जा सके।
राजा का यह निर्णय तेनालीराम को पसंद नहीं आया और राजा को समझाने के लिए उसने एक योजना बनाई।
तेनालीराम अपनी बिल्ली को पीने के लिए प्रतिदिन गर्म दूध देता। बिल्ली जैसे ही दूध पीती उसकी जीभ बुरी तरह जल जाती इसलिए बिल्ली ने धीरे-धीरे दूध पीना ही छोड़ दिया।
एक दिन राजा बिल्लियों का निरीक्षण करने के लिए शहर गए। राजा ने देख कि सभी घरों की बिल्लियां तो स्वस्थ हैं, परंतु तेनालीराम की बिल्ली बहुत दुर्बल व पतली है।
पूछने पर तेनालीराम बोला, 'यह बिल्ली दूध ही नही पीती।'
तेनालीराम की बात की सत्यता जांचने के लिए राजा के कहने पर बिल्ली को दूध दिया गया, परंतु सदा की तरह अपनी जली जीभ की याद आते ही वह दूध देख तुरंत भाग गई।
राजा समझ गए कि अवश्य ही इसमें तेनालीराम की कोई चाल है। इससे अवश्य ही कुछ ऐसा किया है जिससे कि बिल्ली दूध को देखते ही भाग जाती है।
वे क्रोधित होकर अपने सैनिकों से बोले, 'तेनाली को सौ कोड़े मारे जाएं।'
तेनालीराम ने राजा की ओर देखा और बोला, 'महाराज, मुझे सौ कोड़े मारिए, मुझे इसका कोई दुख नहीं है, परंतु मैं यही सोचता हूं कि जब मनुष्यों को पीने के लिए उपयुक्त मात्रा में दूध उपलब्ध नहीं है, तब बिल्लियों को इस प्रकार दूध पिलाना उचित है?'
राजा को तुरंत ही अपनी गलती का एहसास हो गया। उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि गायों के दूध का उपयोग बिल्लियों के बजाय मनुष्यों के लिए किया जाए।


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महामूर्ख की उपाधि

विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय होली का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाते थे। इस अवसर पर हास्य-मनोरंजन के कई कार्यक्रम होते थे। हर कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार भी दिया जाता था। सबसे बड़ा पुरस्कार ‘महामूर्ख’ की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था।
कृष्णदेव राय के दरबार में तेनालीराम सबका मनोरंजन करते थे। वे बहुत तेज दिमाग के थे। उन्हें हर साल का सर्वश्रेष्ठ हास्य-कलाकर का पुरस्कार तो मिलता ही था, ‘महामूर्ख’ का खिताब भी हर साल वही जीत ले जाते।
दरबारी इस कारण से उनसे जलते थे। उन्होंने एक बार मिलकर तेनालीराम को हराने की युक्ति निकाली। इस बार होली के दिन उन्होंने तेनालीराम को खूब छककर भांग पिलवा दी। होली के दिन तेनालीराम भांग के नशे में देर तक सोते रहे। उनकी नींद खुली तो उन्होंने देखा दोपहर हो रही थी। वे भागते हुए दरबार पहुंचे। आधे कार्यक्रम खत्म हो चुके थे।
कृष्णदेव राय उन्हें देखते ही डपटकर पूछ बैठे, 'अरे मूर्ख तेनालीरामजी, आज के दिन भी भांग पीकर सो गए?'
राजा ने तेनालीराम को 'मूर्ख' कहा, यह सुनकर सारे दरबारी खुश हो गए।
उन्होंने भी राजा की हां में हां मिलाई और कहा, 'आपने बिलकुल ठीक कहा, तेनालीराम मूर्ख ही नहीं महामूर्ख हैं।'
जब तेनालीराम ने सबके मुंह से यह बात सुनी तो वे मुस्कराते हुए राजा से बोले, 'धन्यवाद महाराज, आपने अपने मुंह से मुझे महामूर्ख घोषित कर आज के दिन का सबसे बड़ा पुरस्कार दे दिया।'
तेनालीराम की यह बात सुनकर दरबारियों को अपनी भूल का पता चल गया, पर अब वे कर भी क्या सकते थे?
क्योंकि वे खुद ही अपने मुंह से तेनालीराम को महामूर्ख ठहरा चुके थे। हर साल की तरह इस साल भी तेनालीराम ‘महामूर्ख’ का पुरस्कार जीत ले गए।



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रसगुगुल्ले की जड़

मध्य पूर्वी देश से एक ईरानी शेख व्यापारी महाराज कृष्णदेव राय का अतिथि बन कर आता है। महाराज अपने अतिथि का सत्कार बड़े भव्य तरीके से करते हैं और उसके अच्छे खाने और रहने का प्रबंध करते हैं, और साथ ही कई अन्य सुविधाएं भी प्रदान करते हैं।
एक दिन भोजन पर महाराज का रसोइया शेख व्यापारी के लिए रसगुल्ले बना कर लता है। व्यापारी कहता है कि उसे रसगुल्ले नहीं खाने है। पर हो सके तो उन्हे रसगुल्ले की जड़ क्या है यह बताए।
रसोइया सोच मे पड़ जाता है और अवसर आने पर महाराज कृष्णदेव राय को व्यापारी की मांग बताता है। महाराज रसगुल्ले की जड़ पकड़ने के लिए अपने चतुर मंत्री तेनालीराम को बुलाते हैं।
तेनालीराम झट से रसगुल्ले की जड़ खोजने की चुनौती का प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं। वह एक खाली कटोरे और धार दार छूरि की मांग करते हैं और महाराज से एक दिन का समय मांगते हैं।
अगले दिन रसगुल्ले की जड़ के टुकड़ो से भरे कटोरे को, मलमल से ढके कपड़े मे ला कर राज दरबार में बैठे ईरानी शेख व्यापारी को देते हैं और उसे कपड़ा हटा कर रसगुल्ले की जड़ देखने को कहते हैं। ईरानी व्यापारी कटोरे में गन्ने के टुकड़े देख कर हैरान हो जाता है और सारे दरबारी तथा महाराज कृष्णदेव राय, तेनालीराम से पूछते है के यह क्या है?
चतुर तेनालीराम समझाते हैं के हर एक मिठाई शक्कर से बनती है और शक्कर का स्रोत गन्ना होता है।इस लिए रसगुल्ले की जड़ गन्ना है। तेनालीराम के इस गणित से सारे दरबारी, ईरानी व्यापारी और महाराज कृष्णदेव राय प्रफ़्फुलित हो कर हंस पड़ते हैं और तेनालीराम के तर्क से सहमत भी होते हैं।


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तेनालीराम का मरियल घोड़ा

राजा कृष्णदेव राय का घोड़ा अच्छी नस्ल का था इसलिए उसकी कीमत ज्यादा थी। तेनालीराम का घोड़ा मरियल था। तेनालीराम उसे बेचना चाहते थे, पर उसकी कीमत बहुत ही कम थी। वे चाहकर भी बेच नहीं पाते थे।
एक दिन राजा कृष्णदेव राय और तेनालीराम अपने-अपने घोड़े पर सवार होकर सैर को निकले। सैर के दौरान राजा ने तेनालीराम के घोड़े की मरियल चाल देखकर कहा, 'कैसा मरियल घोड़ा है तुम्हारा, जो कमाल मैं अपने घोड़े के साथ दिखा सकता हूं, वह तुम अपने घोड़े के साथ नहीं दिखा सकते।'
तेनालीराम ने राजा को जवाब दिया, 'महाराज जो मैं अपने घोड़े के साथ कर सकता हूं वह आप अपने घोड़े के साथ नहीं कर सकते।'
राजा मानने को जरा भी तैयार नहीं थे। दोनों के बीच सौ-सौ स्वर्ण मुद्राओं की शर्त लग गई।
दोनों आगे बढ़े। सामने ही तुंगभद्रा नदी पर बने पुल को वे पार करने लगे। नदी बहुत गहरी और पानी का प्रवाह तेज था। उसमें कई जगह भंवर दिखाई दे रहे थे।
एकाएक तेनालीराम अपने घोड़े से उतरे और उसे पानी में धक्का दे दिया।
उन्होंने राजा से कहा, 'महाराज अब आप भी अपने घोड़े के साथ ऐसा ही करके दिखाइए।'
मगर राजा अपने बढ़िया और कीमती घोड़े को पानी में कैसे धक्का दे सकते थे। उन्होंने तेनालीराम से कहा, 'न बाबा न, मैं मान गया कि मैं अपने घोड़े के साथ यह करतब नहीं दिखा सकता, जो तुम दिखा सकते हो।'
इस पर राजा ने तेनालीराम को सौ स्वर्ण मुद्राएं दे दीं।
'पर तुम्हें यह विचित्र बात सूझी कैसे?' राजा ने तेनालीराम से पूछा।
'महाराज, मैंने एक पुस्तक में पढ़ा था कि बेकार और निकम्मे मित्र का यह फायदा होता है कि जब वह नहीं रहे, तो दुख नहीं होता।' तेनालीराम की यह बात सुनकर राजा ठहाका लगाकर हंस पड़े।



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नाई की उच्च नियुक्ति

शाही नाई का कार्य प्रतिदिन राजा कृष्णदेव राय की दाढ़ी बनाना था। एक दिन, जब वह दाढ़ी बनाने के लिए आया तो राजा कृष्णदेव राय सोए हुए थे। नाई ने सोते हुए ही उनकी दाढ़ी बना दी।
उठने पर राजा ने सोते हुए दाढ़ी बनाने पर नाई की बहुत प्रशंसा की। राजा उससे बहुत प्रसन्न हुए और उसे इच्छानुसार कुछ भी मांगने को कहा।
इस पर नाई बोला, 'महाराज, मैं आपके शाही दरबार का दरबारी बनना चाहता हूं।'
राजा नाई की इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हो गए। नाई की उच्च नियुक्ति का समाचार जैसे ही चारों ओर फैला, अन्य दरबारी यह सुनकर व्याकुल हो गए।
सभी ने सोचा कि अज्ञानी व्यक्ति दरबारी बनकर अपने पद का दुरुपयोग कर सकता है। सभी दरबारी समस्या के समाधान के लिए तेनालीराम के पास पहूंचे। तेनालीराम ने उन्हें सहायता का आश्वासन दिया।
अगली सुबह राजा नदी किनारे सैर के लिए गए। वहां उन्होंने तेनालीराम को एक काले कुत्ते को जोर से रगड़-रगड़कर नहलाते हुए देखा तो हैरान हो गए। राजा द्वारा कारण पूछने पर तेनालीराम ने बताया, 'महाराज, मैं इसे गोरा बनाना चाहता हूं।'
राजा ने हंसते हुए पूछा, 'क्या नहलाने से काला कुत्ता गोरा हो जाएगा?'
'महाराज, जब एक अज्ञानी व्यक्ति दरबारी बन सकता है तो यह भी गोरा हो सकता है।' तेनालीराम ने उत्तर दिया।
यह सुनकर राजा तुरंत समझ गए कि तेनालीराम क्या कहना चाहता है। उसी दिन राजा ने दरबार में नाई को पुनः उसका वही स्थान दिया, जिसके लिए वह उपयुक्त था।


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तेनालीराम की चतुराई

एक गर्मी की रात, जब तेनालीराम और उनकी पत्नी सो रहे थे, तो उन्हें बाहर से पत्तियों के सरसराने की आवाज सुनाई दी .उस समय हवा भी नहीं चल रही थी, इसलिए उन्होंने सोचा कि झाड़ियों में चोर छिपे है। अब वे सोचने लगे की उन्हें आखिर क्या करना चाहिए जिससे चोर भी पकड़ा जाये और किसी को कोई नुकसान भी न हो| तभी तेनालीराम को चोर को पकड़ने की एक युक्ति सूझी।
उन्होंने एक योजना के बारे में सोचा और अपनी पत्नी से कहा, “प्रिय, मैंने सुना है कि हमारे पड़ोस में कुछ कुख्यात चोर रहते हैं। इसलिए हमें अपने सभी गहने और पैसो को छिपा देना चाहिए ताकि वे सुरक्षित रहें.
थोड़ी देर बाद तेनालीराम और उनकी पत्नी एक बड़े ट्रंक को लेकर घर से निकल पड़े और उसे कुएं में गिरा दिया. तब वे घर के अंदर वापस चले गए, और सो जाने का नाटक करने लगे।
चोर थोड़ी देर इंतजार करने लगे और फिर उन्होंने कुएं से पानी खींचना शुरू कर दिया।
वे कुएं को खाली करके खजाना पाने की कोशिश कर रहे थे। चोर पूरी रात पानी बाहर निकालते रहे| सुबह तक वे ट्रंक को बाहर निकालने में कामयाब रहे, और जब उन्होंने इसे खोला तो वे चौंक गए क्योकि इसमें केवल कुछ बड़े पत्थर रखे थे।
उन्हें समझा आ गया कि यह तेनालीराम की योजना थी। तभी तेनालीराम कुछ सैनिको के साथ वहां आये और कहा, ” धन्यवाद दोस्तों, मेरे पौधों को पानी देने के लिए। मुझे आपके श्रम के लिए आपको भुगतान करना होगा। ”
यह सुनकर, सभी चोर तेनालीराम के पैर में गिर गए और माफ़ी मांगने लगे। उन्होंने वादा किया की वे अब से कभी चोरी नहीं करेंगे। तेनाली ने उन्हें जाने देने का फैसला किया।
शिक्षा/Moral:- हालात चाहे कितने भी गंभीर हो हम अपनी बुद्धि का उपयोग करके अपने आप को उससे बाहर निकल सकते हैं बस जरुरत है अपने दिमाग को शांत रखकर फैसला लेने की।


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